Rubio-Modi Summit in New Delhi: भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत-अमेरिका के रिश्तों को मिली नई ऊर्जा
Rubio-Modi Summit in New Delhi: पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी युद्ध और ईरान संकट के कारण जब पूरी दुनिया का एनर्जी कॉरिडोर ठप होने की कगार पर है, ठीक उसी संवेदनशील मोड़ पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक मुलाकात की है. इस बैठक का सीधा असर न सिर्फ भारत की लड़खड़ाती ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ेगा, बल्कि इससे आने वाले दिनों में दोनों देशों के आर्थिक और रक्षा समीकरण भी पूरी तरह बदलने वाले हैं.
अमेरिका ने साफ कर दिया है कि वैश्विक संकट के इस दौर में वह भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और देश को बिना किसी रुकावट के कच्चे तेल और गैस की सप्लाई सुनिश्चित करेगा.
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का संकट और भारतीय अर्थव्यवस्था पर चोट
वर्तमान में खाड़ी देशों में जो हिंसक तनाव बना हुआ है, उसने भारतीय बाजारों की कमर तोड़ दी है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग $90\%$ हिस्सा जिस समुद्री रास्ते (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) के जरिए आयात करता है, वहां जहाजों की आवाजाही लगभग पूरी तरह थम चुकी है.
इस सप्लाई चेन के टूटने का सीधा खामियाजा भारत के आम नागरिकों और निवेशकों को भुगतना पड़ रहा है:
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महंगाई की मार: पिछले महज 10 दिनों के भीतर देश में तेल की कीमतों में तीन बार बढ़ोतरी की जा चुकी है.
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कमजोर होता रुपया: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने सर्वकालिक निचले स्तर 96.96 पर आ गिरा है.
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शेयर बाजार में हड़कंप: इस अनिश्चित माहौल को देखते हुए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से अपने अरबों डॉलर निकालना शुरू कर दिया है, जिससे बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई है.
अमेरिका का 'एनर्जी कार्ड': क्या है वाशिंगटन का असली प्लान?
इस गंभीर आर्थिक चुनौती के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का यह दौरा नई दिल्ली के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है. रुबियो ने पीएम मोदी को भरोसा दिया कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन किसी भी कीमत पर ईरान को वैश्विक तेल बाजार पर मनमानी नहीं करने देगा. उन्होंने भारत के सामने एक खुला प्रस्ताव रखा:
"भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए जितने भी ईंधन की आवश्यकता है, अमेरिका उतनी पूरी ऊर्जा सप्लाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है।"
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस रणनीति की पुष्टि की है. उन्होंने बताया कि भारत अब खाड़ी देशों के पारंपरिक रूट्स पर अपनी निर्भरता कम करते हुए अमेरिका से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीद रहा है. शिपिंग डेटा के मुताबिक, इसी महीने भारत ने अमेरिका से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और एलपीजी (LPG) के आयात के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. अमेरिका का सीधा मकसद भारत को खाड़ी देशों और रूस के पाले से निकालकर अपने आर्थिक दायरे में मजबूती से बांधना है.
पुरानी खटास को भुलाकर आगे बढ़ने की कवायद
यह कूटनीतिक मुलाकात केवल तेल और गैस के लेन-देन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से जमी बर्फ को पिघलाने की एक बड़ी कोशिश भी है.
गौरतलब है कि पिछले साल भारत-पाकिस्तान के मुद्दों पर अमेरिकी बयानों और यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा लगातार रूसी कच्चा तेल खरीदने की जिद से वाशिंगटन नाराज था.
अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई करते हुए भारतीय सामानों पर $25\%$ का अतिरिक्त टैरिफ ठोक दिया था, जिससे रिश्तों में कड़वाहट आ गई थी.
लेकिन अब बदले हुए वैश्विक हालातों और तेल बाजार को स्थिर रखने की मजबूरी ने अमेरिका को अपना सख्त रवैया छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. वाशिंगटन अब प्रतिबंधों की धमकियां देने के बजाय भारत की सप्लाई चेन को सुरक्षित करने को प्राथमिकता दे रहा है.
'क्वाड' का मंच और भविष्य का रोडमैप
अपनी इस यात्रा के दौरान मार्को रुबियो दिल्ली में आयोजित 'क्वाड' (Quad) सदस्य देशों की उच्चस्तरीय बैठक में भी शिरकत कर रहे हैं. इस मंच पर अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के शीर्ष अधिकारी मिलकर हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, उन्नत डिफेंस को-ऑपरेशन और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी को साझा करने पर एक साझा रणनीति तैयार करेंगे.
निष्कर्ष:
यह पूरी कवायद दोनों देशों के लिए 'विन-विन' सिचुएशन जैसी है. जहां एक तरफ भारत के लिए यह समझौता अपनी डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभालने और देश को ईंधन संकट से बचाने का एक अचूक जरिया है, वहीं वाशिंगटन के लिए यह सुनिश्चित करने का सबसे सही मौका है कि एशिया की यह सबसे बड़ी लोकतांत्रिक महाशक्ति रणनीतिक रूप से पूरी तरह अमेरिका के पाले में खड़ी रहे.
