Rupee Fall: क्या भारतीय रुपये को कमजोर कर रहा है आपका SIP? जेफरीज की रिपोर्ट पर दिग्गज फंड मैनेजर समीर अरोड़ा का बड़ा बयान

Rupee Fall: भारतीय करेंसी (रुपये) में आ रही रिकॉर्ड गिरावट और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार बिकवाली के बीच अब घरेलू निवेशकों के सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है.

 
Rupees rate fall

दिग्गज ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेफरीज (Jefferies) की एक हालिया रिपोर्ट के बाद बाजार में यह बहस छिड़ गई है कि क्या भारतीय रिटेल निवेशकों के मजबूत और लगातार आ रहे SIP इनफ्लो ने विदेशी फंड्स को भारतीय शेयर बाजार से आसानी से मुनाफावसूली करके बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता (Exit Route) दे दिया? आलोचकों का मानना है कि इससे अप्रत्यक्ष रूप से रुपये पर दबाव और ज्यादा बढ़ गया है.

हालांकि, इस पूरे विवाद पर वित्तीय जगत के जाने-माने निवेशक और हेलियोस कैपिटल (Helios Capital) के संस्थापक समीर अरोड़ा ने SIP निवेशकों का पुरजोर समर्थन किया है और इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है.

"SIP न होता, तो पैसा सोने या विदेशी बाजारों में जाता"—समीर अरोड़ा

समीर अरोड़ा का तर्क है कि यह मान लेना पूरी तरह तर्कहीन है कि अगर घरेलू निवेशक म्यूचुअल फंड या SIP में पैसा नहीं लगाते, तो उससे रुपये को कोई जादुई फायदा मिल जाता. उन्होंने एक बुनियादी सवाल उठाया कि अगर रिटेल निवेशक SIP में निवेश बंद कर दें, तो वह पैसा आखिर जाएगा कहाँ?

उनके मुताबिक, निवेशक इस पैसे का इस्तेमाल इन चार जगहों पर करते:

  1. विदेशी बाजारों में निवेश: आज के दौर में भारतीयों के बीच ग्लोबल स्टॉक्स और विदेशी फंड्स में निवेश का क्रेज तेजी से बढ़ा है. अगर निवेशक अपना पैसा अमेरिकी या वैश्विक बाजारों में लगाते, तो इससे डॉलर की मांग और तेज होती, जिससे रुपया और ज्यादा कमजोर हो जाता.

  2. सोने की खरीदारी: भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात (Import) करता है. अगर लोग म्यूचुअल फंड के बजाय सोना खरीदते, तो देश का इम्पोर्ट बिल बढ़ता, जिससे रुपये की सेहत पर उल्टा और बुरा असर पड़ता.

  3. गैर-जरूरी और लग्जरी खर्च: यदि यह पैसा निवेश होने के बजाय महंगे स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, विदेशी सामानों या लग्जरी लाइफस्टाइल पर खर्च होता, तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को कोई दीर्घकालिक या स्थायी मजबूती नहीं मिलती.

  4. लो-इंटरेस्ट बैंक डिपॉजिट: आखिरी विकल्प के रूप में लोग इसे कम ब्याज वाले पारंपरिक बैंक खातों में छोड़ देते, जिससे वे संपत्ति (Wealth Creation) बनाने से चूक जाते.

अरोड़ा ने जोर देकर कहा कि SIP एक अनुशासित निवेश माध्यम है, जो देश के भीतर संपत्ति का निर्माण करता है और इसके बंद होने से रुपये को कोई फायदा नहीं होने वाला.

आखिर जेफरीज की रिपोर्ट में ऐसा क्या था, जिससे छिड़ी बहस?

दरअसल, जेफरीज ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में विश्लेषण किया था कि भारतीय रुपये की मौजूदा कमजोरी की मुख्य वजह भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) नहीं, बल्कि कमजोर कैपिटल फ्लो (कमजोर पूंजी प्रवाह) है.

रिपोर्ट के कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • FIIs की भारी बिकवाली: पिछले दो सालों के भीतर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 78 अरब डॉलर की भारी-भरकम रकम निकाली है.

  • बाजार का ढाल बना SIP: विदेशी फंड्स की इस आक्रामक बिकवाली के बावजूद भारतीय शेयर बाजार ताश के पत्तों की तरह नहीं बिखरा, क्योंकि घरेलू निवेशकों के SIP, टैक्स इंसेंटिव और EPFO व NPS जैसे संस्थागत फंड्स ने बाजार को मजबूती से थामे रखा.

रिकॉर्डतोड़ घरेलू निवेश: एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2026 में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में रिकॉर्ड ₹38,503 करोड़ का नेट इनफ्लो देखा गया था. इसके ठीक अगले महीने, अप्रैल 2026 में भी यह रफ्तार जारी रही और ₹38,410 करोड़ का भारी निवेश म्यूचुअल फंड्स में आया.

उभरते बाजारों में सबसे कमजोर हुआ रुपया, पर आगे क्या?

ग्लोबल मार्केट की उठापटक और वेस्ट एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के भू-राजनीतिक संकट के चलते भारतीय रुपया इस साल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब $7\%$ तक टूट चुका है और 96 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है. इस भारी गिरावट के कारण रुपया वर्तमान में उभरते बाजारों (Emerging Markets) की सबसे कमजोर मुद्राओं की सूची में शामिल हो गया है.

जेफरीज का सकारात्मक नजरिया:

हालांकि, जेफरीज का मानना है कि इस गिरावट के बाद भारतीय बाजारों में विदेशी निवेशकों की वापसी की उम्मीदें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. ब्रोकरेज के मुताबिक, जैसे ही भारतीय शेयर बाजार का वैल्यूएशन दोबारा आकर्षक स्तर पर आएगा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ा ग्लोबल ट्रेड शांत होगा और मिडल ईस्ट का तनाव कम होगा, वैसे ही विदेशी निवेशक एक बार फिर भारतीय बाजारों का रुख करेंगे, जिससे रुपये को दोबारा मजबूती मिलेगी.

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